शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

खुशी

ए! खुशी कभी हमारा दरवाज़ा भी खटखटा
यूं गैरों की तरह नज़रें चुराकर तो न जा

तन्हा-तन्हा दिन कटता,रातें कटी बेज़ार,
थक गए करते-करते अब तेरा इंतजार
कभी अपने आगोश में लेकर,मीठी नींद सुला
ए! खुशी अब आ भी जा.....

अपने लिए सब एक से हैं,क्या होली-दीवाली,
जेबों की तरह है अपनी किस्मत खाली-खाली
कच्चे घर की चौखट पे भी अरमानो के दीप जला
ए! खुशी अब आ भी जा.....

तोरण द्वार सजे;महके घर का अँगना,
बेटी डोली में बैठे पूरा हो यह सपना
हमारी गली में भी बारात की शहनाई बजा
ए! खुशी अब आ भी जा.....

1 टिप्पणी:

कविता रावत ने कहा…

....सुन्दर प्रस्तुति
नवरात्र की सभी को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ